अच्छी बात : जब बुद्ध ने बताया शांति कैसे मिलती है?

अच्छी बात

जानें, शांति के लिए सबसे “अच्छी बात” क्या है? भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ा यह प्रेरक प्रसंग एक अंधे व्यक्ति की भी आँखे खोलने में सक्षम है।

एक बार एक सेठ ने भगवान बुद्ध को दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए पूछा, भगवन, मैं प्रतिदिन आपके प्रवचन सुनने के लिए इतनी दूर से आता हूँ, लेकिन मुझे अभी तक शांति नहीं मिली। मेरा मन पहले से भी ज्यादा अशांत हो गया है। कृपा कर मेरा मार्ग-दर्शन करें।

भगवान बुद्ध ने उस सेठ को गौर से देखा, और फिर पूछा:- तुम कहाँ के रहने वाले हो?

सेठ बोला:- जी, मैं श्रावस्ती का रहनेवाला एक सेठ हूँ, और आपके बारे में बहुत चर्चा सुनने के बाद शांति की खोज में आपके प्रवचन सुनने प्रतिदिन यहाँ आता हूँ।

बुद्ध बोले:- श्रावस्ती यहाँ से कितनी दूर है?

सेठ बोला:- यही कोई 25 कोस।

बुद्ध ने पूछा:- तुम श्रावस्ती से यहाँ कैसे आते हो?

सेठ बोला:- जी, मैं अपने घोड़े पर बैठ कर आता हूँ।

बुद्ध ने फिर पूछा:- तुम्हें यहाँ तक आने में कितना समय लगता है?

सेठ बोला:- लगभग 2 घंटे।

इसके बाद बुद्ध ने आखिरी सवाल पूछा:- अगर मैं तुम्हारा घोड़ा अपने पास रख लूँ और तुम्हारे दोनों पैर एक रस्सी से बाँध दूँ, तो क्या तुम बैठे-बैठे श्रावस्ती पहुँच सकते हो?

सेठ ने आश्चर्य से बोला:- ऐसा कैसे संभव हो सकता है भगवन? श्रावस्ती पहुँचने के लिए मुझे चलना पड़ेगा। बिना चले मैं कैसे पहुँच सकता हूँ भला?

बुद्ध बोले:- ठीक कहा तुमने। लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चलना जरुरी है। बिना चले हम कहीं भी नहीं पहुँच सकते। तुम प्रतिदिन मेरा प्रवचन सुनने के लिए सिर्फ इसलिए आ रहे हो ताकि तुम्हारे मन को शांति मिल सके।

इस समय तुम्हारा लक्ष्य शांति पाना है। इसके लिए तुम्हें मेरे द्वारा बताई गई बातों को अपने जीवन में उतारना होगा। सिर्फ सुन लेने मात्र से कुछ नहीं होने वाला। मेरे द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना पड़ेगा। मेरे द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने के लिए तुम्हें झूठ और दिखावे की जिंदगी से उपर उठते हुए सच्चे मन से जरुरतमन्द लोगों की सहायता करनी होगी। लोगों की सहायता करने से तुम्हारा चित प्रसन्न होगा और तुम्हें सचमुच में शांति की अनुभूति होगी।

बुद्ध की ये बातें सेठ को अंदर तक छू गईं। अपने घर पहुँचने के बाद सेठ ने भगवान् बुद्ध के बताए हुए मार्ग पर चलना शुरू कर दिया। अगली बार जब वह भगवान् बुद्ध के समक्ष पहुंचा तब तक उसका कायाकल्प हो चूका था। उसके मन के सारे द्वन्द ख़तम हो चुके थे और उसके मन-मस्तिष्क में एक गजब की शांति विराजमान हो चुकी थी। 

टीचिंग ऑफ अच्छी बात 

शांति कहीं बाहर नहीं बल्कि हमारे अंदर होती है। लोभ, मोह, अहंकार, इर्ष्या, वैमनस्य इत्यादि दुर्गुणों की वजह से उसपर एक एक आवरण चढ़ा होता है। जैसे ही हम अपने इन दुर्गुणों को खतम करना शुरू करते हैं, ये आवरण हट जाता है और हमें शांति की अनुभूति होने लगती है। शांति कहीं तीर्थ यात्रा में नहीं बल्कि जरुरतमन्द लोगों की सहायता करने में हैवैसे भी जरुरतमन्द लोगों की सहायता करना “अच्छी बात” है।

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