एक समय की बात है। एक बहुत ही सुंदर तालाब में कम्बुग्रीव नाम का कछुआ रहता था। उसी तालाब में दो हंसों का जोड़ा तैरने के लिए आता था। दोनों हंस बहुत ही दयालु और मिलनसार स्वभाव के थे। कुछ दिनों बाद ही कछुए और दोनों हंसों में गहरी दोस्ती हो गई।

हंस बहुत ज्ञानी थे और वे कछुए को बहुत अच्छी अच्छी कहानियां सुनाया करते थे। लेकिन कछुआ बहुत ही बातूनी था। वह बीच-बीच में टोका-टाकी करता रहता था….

पंचतंत्र की इस कहानी, Panchtantra kahaniyan को पढ़ने से हमें यह जानने को मिलेगा कि बेवजह की बकबक क्यों नहीं करनी चाहिए?

एक समय की बात है। एक बहुत ही सुंदर तालाब में कम्बुग्रीव नाम का कछुआ रहता था। उसी तालाब में दो हंसों का जोड़ा तैरने के लिए आता था। दोनों हंस बहुत ही दयालु और मिलनसार स्वभाव के थे। कुछ दिनों बाद ही कछुए और दोनों हंसों में गहरी दोस्ती हो गई।

हंस बहुत ज्ञानी थे और वे कछुए को बहुत अच्छी अच्छी कहानियां सुनाया करते थे। लेकिन कछुआ बहुत ही बातूनी था। वह बीच-बीच में टोका-टाकी करता रहता था। लेकिन हंस अपने अच्छे स्वभाव के कारण उसका कभी बुरा नहीं मानते थे।  इस प्रकार उन तीनों की दोस्ती बहुत अच्छे से निभा रही थी। प्रतिदिन शाम होते ही तीनों अपने अपने घर को लौट जाते थे।

एक बार उस क्षेत्र में बहुत बड़ा सूखा पड़ा। बारिश ना होने की वजह से तालाब का पानी सूखने लगा। तालाब की सारी मछलियां मर गई। एक समय तो ऐसा हुआ कि तालाब में सिर्फ कीचड़ ही रह गया। अब तो कछुआ के  जीवन मरण का सवाल आ गया था। दोनों हंसों को अपने इस दोस्त की बहुत चिंता हुई। वे दोनों बहुत दुखी हुए।

वे दोनों उड़कर बहुत दूर जल की तलाश में निकले और एक बहुत बड़ी झील का पता लगा कर लौटे। फिर वो कछुआ से बोले, यहां से 50 कोस की दूरी पर एक बहुत बड़ी झील है। उस झील में  बहुत पानी है। अगर तुम वहां चले जाओ तो खूब मजे करोगे।

उनकी बात सुनकर कछुआ बोलै, मित्र! मैं तो एक कछुआ हूँ, धीरे-धीरे चलने वाला प्राणी। मैं 50 कोस दूर तक कैसे जा पाउँगा। ऐसी कोशिश करते हुए तो मैं लोगों का आसान शिकार बन जाऊंगा। अब तुम ही दोनों कोई जुगाड़ लगाओ।

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 कछुए की इस बात पर दोनों हंसों ने अपना दिमाग लगाया और उपाय ढूंढ निकाला। अगले दिन दोनों हंस एक लकड़ी का टुकड़ा लाए और कछुए से बोले, मित्र हम दोनों लकड़ी के दोनों किनारों को पकड़ लेंगे और तुम बीच में पकड़ कर लटक जाना। फिर हम दोनों तुम्हें लेकर आकाश में उड़ चलेंगे। लेकिन ध्यान रहे की बीच रास्ते में तुम अपनी आदत के अनुसार कुछ बोलने के लिए मुंह मत खोलना। अगर बोलने की कोशिश भी करोगे तो सीधे जमीन पर गिरकर मर जाओगे ।

अपने दोस्तों की बात कछुए को बहुत पसंद आई। कछुआ बोलै, बिल्कुल भी नहीं बोलूंगा मित्र।

अपनी योजना के अनुसार कछुआ लकड़ी को बिच से पकड़कर लटक गया और दोनों हंस लकड़ी के दोनों किनारे पकड़कर आसमान में उड़ चले।

 जब वे एक बस्ती के ऊपर से उड़ रहे थे तब  बस्ती के लोगों की नजर उड़ते हुए कछुए पे पड़ी तो वे जोर-जोर से ताली पिटेते हुए चिल्लाने लगे- वो देखो ! कछुआ उड़ रहा है !

उन बस्ती वालों की आवाज सुनकर कछुए की नजर नीचे शोर मचा रहे लोगों पे पड़ी तो वह ख़ुशी से पागल हो  गया। फिर तो वो बातूनी कछुआ अपने मित्रों की चेतावनी भूल गया। उसके बाद तो वो हो गया जिसका पहले से ही डर था। कछुआ चिल्लाकर दोनों हंसों से बोलना चाहा कि, देखो वे सब मुझे उड़ते हुए देखकर कितने खुश हैं।

लेकिन बेचारे कछुए ने यह बात बोलने के लिए जैसे ही अपना मुंह खोला, उसके मुंह से लकड़ी छुट गई और वह कछुआ धढ़ाम से जमीन पर आ गिरा। जमीन पर गिरने के साथ ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये ।

शिक्षा : Teachings of panchtantra kahaniyan

1.  मौका देखकर बोलना चाहिए। मौका-बेमौका बोलना अक्सर नुकसानदायक ही होता है । जैसे पंचतंत्र की इस कहानी में कछुआ बिना मौका के बोलना चाहा तो उसको उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

2.  बुरी आदत जल्द नहीं छूटती। जैसे इस panchtantra kahaniyan में बातूनी कछुआ बकबक करने की आदत को नहीं छोड़ पाया।

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