बगुला और केकड़े की कहानी | Panchtantra ki Kahani in Hindi

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पंचतंत्र की इस हिंदी कहानी (panchtantra ki kahani in hindi) में किसी पे आँख मूंदकर भरोसा क्यों नहीं करनी चाहिए, यह जानने को मिलेगा। पंचतंत्र की इस कहानी ((panchtantra ki kahani in hindi) में यह भी सिखने को मिलेगा कि विपरीत परिस्थितियों को भी हम अपने धैर्य और साहस के बल पे कैसे अपने अनुकूल बना सकते हैं। 

बहुत पुरानी बात है। एक वन प्रदेश में एक सुंदर तालाब था। उस तालाब के किनारे एक आलसी बगुला रहा करता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल ही पसंद नहीं था। वह बगैर परिश्रम किए ही अपना पेट भरना चाहता था। 

एक दिन उसे एक उपाय सूझा। वह तालाब के किनारे एक पांव पर खड़ा होकर आंसू बहाने लगा।

जब एक केकड़े ने उस बगुले के आंख से आंसू बहते देखा तो उसके नजदीक आकर पूछा, बगुला मामा ! क्या बात है ? आपको तो अपना पेट भरने के लिए मछलियों का शिकार करना चाहिए। लेकिन आप यहां रो रहे हो।

बगुले ने जोर की हिचकी ली और रुंधे हुए गले से बोला, मैंने बहुत पाप कर लिया। बहुत मछलियों का शिकार कर लिया। अब मुझसे यह पाप का कार्य और नहीं होगा। मेरी अंतरात्मा अब जग गई है। अब मैं एक साधु बन गया हूं। इसीलिए अपने निकट आनेवाली मछलियों का भी शिकार नहीं करता।

केकड़ा बोला, मामा ! अगर शिकार नहीं करोगे तब तो आप भूखों मर जाओगे।

बगुले ने बोला, बेटे, वैसे भी हम सभी को तो एक दिन मरना ही है। फिर यह पाप कार्य करके क्यों मरें ? मुझे एक बहुत ही पहुंचे हुए त्रिकालदर्शी महात्मा से एक बात पता चली है कि यहां 12 वर्षों का बहुत बड़ा अकाल पड़ने वाला है। तब इस तालाब का पानी भी सूख जाएगा। और तब इस तालाब के सभी जीव जंतु बेमौत मारे जाएंगे।

जब से मुझे यह बात पता चली है तब से मैंने जीवों का शिकार करना छोड़ दिया है। अब मेरा बाकी का समय भगवान की आराधना और लोगों की सेवा में बीतेगा।

बगुले से यह बात सुनने के बाद उस केकड़े ने तालाब के सभी जीवो को यह दुखद खबर पहुंचाई कि यहां 12 वर्षों का भयंकर अकाल पड़ने वाला है।

इस दुखद खबर को सुनने के बाद  उस तालाब के सभी जीव मछलियां कछुए इत्यादि उस बगुले के पास दौड़े-दौड़े आए और बोले, भगत मामा ! जब इस समस्या के बारे में तुम बताए हो तो इसका समाधान भी तुम ही बताओगे। हम सभी को अकाल मृत्यु में जाने से बचाने के लिए अब आपको ही अपनी अकल लगानी पड़ेगी।

बगुले ने कुछ सोचने का नाटक करते हुए बोला, यहां से कुछ कोस की दुरी पे एक बहुत बड़ा जलाशय है। जिसमें पहाड़ी झरने का पानी लगातार गिरता रहता है। इसलिए  उस जलाशय पर सूखे का कोई असर नहीं पड़ेगा।

अगर इस तालाब के सभी जीव वहां पहुंच जाए तो सब की जान बच सकती है। बस यही एक उपाय है।

लेकिन अब समस्या यह थी कि इतनी दूर उस जलाशय के पास सभी जीवों को कैसे पहुँचाया जाय।

फिर कुछ सोचने का नाटक करते हुए बगुले भगत ने इस समस्या का समाधान बताया कि, अब तो मेरी जिंदगी भगवान के नाम और लोगों की सेवा में ही बीतने वाली है। अब मैं तुम में से एक एक जीव को अपने पीठ पे बिठा-बिठाकर वहां पहुंचाया करूंगा। इस तरह से तुम सभी की जान बच जाएगी। और मुझे तुम लोगों की सेवा करने का पूण्य मिलेगा।

 बगुले भगत की ऐसी बातें सुनने के बाद तालाब के सभी जीव खुशी से गदगद हो गए और बगुला भगत की जय जयकारी लगाने लगे।

अब तो बगुला भगत के हंसी-खुशी के दिन आ गए। अब बगुला भगत रोज तालाब के एक जीव को अपनी पीठ पर बिठाता और आसमान में उड़ जाता।

कुछ दूर ले जाकर वह उन्हें बगल के चट्टान पर पटक कर मार डालता और उन्हें खा जाता। बगुला भगत का कभी मूड होता तो दो-दो फेरे भी लगा लेता।

समय के साथ उधर तालाब में जीवों की संख्या तेजी से घटने लगी और इधर उन जीवों को खा खाकर बगुला भगत की सेहत बनने लगी।

तालाब के दूसरे जीव बगुला भगत को देख कर बोलते, देखो दूसरों की सेवा करने का फल। दूसरों की सेवा करने के पुण्य का फल भगत जी को मिल रहा है। उनका शरीर कितना मोटा और तगड़ा हो रहा है।

 बगुला मन ही मन खूब हंसता है और सोचता, देखो दुनिया में कैसे-कैसे एक से बढ़कर एक मुर्ख भरे पड़े हैं। जो जल्द ही दूसरों की बातों पर विश्वास कर लेते हैं।

अगर थोड़ी सी चालाकी से काम कर लिया जाए तो इस दुनिया में लोगों को मुर्ख बनाने में ज्यादा देर नहीं लगती। बिना हाथ-पैर हिलाए मुफ्त की दावत उड़ाने का इससे बढ़िया और क्या मौका हो सकता है भला।

बहुत दिनों तक यही क्रम चलता रहा।  एक दिन केकड़े ने बगुला से कहा, मामा ! तुम तो सभी जीवो को वहां पहुंचा ही आए हो। अब मुझे भी उस जलाशय में पहुंचा दो।

 बगुला भगत बोला, बेटा आज तेरा ही नंबर है ! आजा मेरी पीठ पर बैठ जा। केकड़ा खुशी-खुशी बगुला मामा के पीठ पर बैठ गया।

जब वह चट्टान के नजदीक पहुंचा तो वहां हड्डियों का ढेर देखकर केकड़े का माथा ठनका। वह सोचा, यहां हड्डियों का इतना ढेर कैसा है ? फिर वह बगुले से बोला, मामा ! जलाशय अभी कितनी दूर है?

 बगुला हंसते हुए बोला, यहाँ कोई जलाशय नहीं है। मेरी पीठ कोई मुफ्त की सवारी ही क्या? जिसे मन हुआ मुफ्त में सफर कर लिया।

मैं एक-एक को पीठ पर बिठाकर यहां लाता हूं और उन्हें मारकर खा जाता हूं। आज तेरी बारी है। अब तू मरने के लिए तैयार हो जा।

केकड़े को बगुले की सारी बात समझ में आ गई। वह मौत के भय से डर गया। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने तुरंत अपने दोनों पंजों से उस दुष्ट बगुले की गर्दन को दबोच लिया और तब तक दबाए रखा जब तक कि वह बगुला मर नहीं गया।

 फिर उस केकड़े ने उस बगुले का सिर काटा और उसे लेकर तलाब पर वापस लौट गया। सभी जीवो को उस दुष्ट बगुले भगत की सच्चाई बताई।

शिक्षा : Teachings of Panchtantra ki Kahani in Hindi

1. किसी की बातों पे आँख मूंदकर कभी भी भरोशा नहीं करनी चाहिए। अन्यथा वही हाल होगा जो उस तालाब की मछलियों औरबाकी के अन्य जीवों का हुआ।

2. कठिन से कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस नहीं खोना चाहिए। जैसे कि केकड़े ने अपनी मौत को सामने देखकर भी अपना धैर्य नहीं खोया और वह अपनी जान बचाने में सफल रहा । उसने दुष्ट बगुले को मारकर बाकि के जीवों के मौत का बदला भी ले लिया।


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